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१९१२ योगिनी एकादशी व्रत का दिन उज्जैन, मध्यप्रदेश, भारत के लिए

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Title
१९१२ योगिनी एकादशी
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१९१२ योगिनी एकादशी उपवास का दिन उज्जैन, भारत के लिए

योगिनी एकादशी व्रत

११वाँ
जून १९१२
(मंगलवार)
योगिनी एकादशी
योगिनी एकादशी

योगिनी एकादशी पारण


१२th को, पारण (व्रत तोड़ने का) समय = ०५:४४ से ०८:२५
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय = १९:५९
एकादशी तिथि प्रारम्भ = १०/जून/१९१२ को २२:०० बजे
एकादशी तिथि समाप्त = ११/जून/१९१२ को २१:२४ बजे
टिप्पणी - २४ घण्टे की घड़ी उज्जैन के स्थानीय समय के साथ और सभी मुहूर्त के समय के लिए डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है)।
१९१२ योगिनी एकादशी

वह एकादशी जो निर्जला एकादशी के बाद और देवशयनी एकादशी से पहले आती है उसे योगिनी एकादशी कहते हैं। उत्तर भारतीय पञ्चाङ्ग के अनुसार आषाढ़ माह में कृष्ण पक्ष के दौरान और दक्षिण भारतीय पञ्चाङ्ग के अनुसार ज्येष्ठ माह में कृष्ण पक्ष के दौरान योगिनी एकादशी पड़ती है। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार योगिनी एकादशी का व्रत जून अथवा जुलाई के महीने में होता है।

लाभ - योगिनी एकादशी का व्रत करने से सारे पाप मिट जाते हैं और जीवन में समृद्धि और आनन्द की प्राप्ति होती है। योगिनी एकादशी का व्रत करने से स्वर्गलोक की प्राप्ति होती है। योगिनी एकादशी तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। यह माना जाता है कि योगिनी एकादशी का व्रत करना अठ्यासी हज़ार ब्राह्मणों को भोजन कराने के बराबर है।

एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।

एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धालु व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि है। व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्याह्न के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। कुछ कारणों की वजह से अगर कोई प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है तो उसे मध्याह्न के बाद पारण करना चाहिए।

कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है। जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब स्मार्त-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं।.

भगवान विष्णु का प्यार और स्नेह के इच्छुक परम भक्तों को दोनों दिन एकादशी व्रत करने की सलाह दी जाती है।
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