deepak

१९११ श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत का दिन उज्जैन, मध्यप्रदेश, इण्डिया के लिए

deepak
Useful Tips on
Panchang
Switch to English
Empty
Title
१९११ श्रावण पुत्रदा एकादशी
वर्ष:
ग्लोब
अपना शहर खोजें:
१९११ श्रावण पुत्रदा एकादशी उपवास का दिन उज्जैन, इण्डिया के लिए

श्रावण पुत्रदा एकादशी व्रत

वाँ
अगस्त १९११
(शनिवार)
श्रावण पुत्रदा एकादशी
श्रावण पुत्रदा एकादशी

श्रावण पुत्रदा एकादशी पारण


६th को, पारण (व्रत तोड़ने का) समय = ०७:३५ से ०८:३९
पारण तिथि के दिन हरि वासर समाप्त होने का समय = ०७:३५
एकादशी तिथि प्रारम्भ = ४/अगस्त/१९११ को २२:२९ बजे
एकादशी तिथि समाप्त = ६/अगस्त/१९११ को ००:५९ बजे
टिप्पणी - २४ घण्टे की घड़ी उज्जैन के स्थानीय समय के साथ और सभी मुहूर्त के समय के लिए डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है)।
१९११ श्रावण पुत्रदा एकादशी

साल की दो एकादशियों को पुत्रदा एकादशी के नाम से जाना जाता है। पौष और श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशियों को पुत्रदा एकादशी कहते हैं।

अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार वर्तमान में पौष शुक्ल पक्ष की एकादशी दिसम्बर या जनवरी के महीने में पड़ती है जबकि श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी जुलाई या अगस्त के महीने में पड़ती है। पौष माह की पुत्रदा एकादशी उत्तर भारतीय प्रदेशों में ज्यादा महत्वपूर्ण जबकि श्रावण माह की पुत्रदा एकादशी दूसरे प्रदेशों में ज्यादा महत्वपूर्ण है।

लाभ - जन्म और मृत्यु के समय में किये जाने वाले संस्कारों का हिन्दु धर्म में अत्यधिक महत्व है। हिन्दु धर्म में मृत्यु के समय कुछ महत्वपूर्ण संस्कार निर्धारित है जो केवल पुत्र द्वारा ही किये जाते हैं। पुत्र के द्वारा किये जाने वाले अन्तिम संस्कारों से ही माता-पिता की आत्मा को मुक्ति मिलती है। माता-पिता की मृत्यु के बाद श्राद्ध की नियमित क्रियायें भी पुत्र द्वारा ही सम्पादित की जाती है। ऐसा माना जाता है कि श्राद्ध करने से मृतक की आत्मा को तृप्ति मिलती है।

जिन दम्पत्तियों को जीवन में पुत्र सुख की प्राप्ति नहीं होती वो अत्यधिक परेशान रहते हैं। पुत्र सुख की प्राप्ति के लिए पुत्र एकादशी का व्रत रखा जाता है। जिन दम्पत्तियों को कोई पुत्र नहीं होता उनके लिए पुत्रदा एकादशी का व्रत अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

वैष्णव समुदाय के बीच श्रावण शुक्ल पक्ष एकादशी को पवित्रोपना एकादशी या पवित्र एकादशी के नाम से जाना जाता है।

एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।

एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धालु व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतिक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि है। व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्यान के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। कुछ कारणों की वजह से अगर कोई प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है तो उसे मध्यान के बाद पारण करना चाहिए।

कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है। जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब स्मार्त-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं।.

भगवान विष्णु का प्यार और स्नेह के इच्छुक परम भक्तों को दोनों दिन एकादशी व्रत करने की सलाह दी जाती है।
« विगत कामिका एकादशी आगामी अजा एकादशी »
10.240.0.62
facebook button