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१९१२ पापमोचिनी एकादशी व्रत का दिन उज्जैन, मध्यप्रदेश, भारत के लिए

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१९१२ पापमोचिनी एकादशी
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१९१२ पापमोचिनी एकादशी उपवास का दिन उज्जैन, भारत के लिए

पापमोचिनी एकादशी व्रत

१४वाँ
मार्च १९१२
(बृहस्पतिवार)
पापमोचिनी एकादशी
पापमोचिनी एकादशी

पापमोचिनी एकादशी पारण


१५th को, पारण (व्रत तोड़ने का) समय = ०६:४० से ०९:०३
पारण तिथि के दिन द्वादशी समाप्त होने का समय = २३:५७
एकादशी तिथि प्रारम्भ = १३/मार्च/१९१२ को १९:२८ बजे
एकादशी तिथि समाप्त = १४/मार्च/१९१२ को २१:५१ बजे
टिप्पणी - २४ घण्टे की घड़ी उज्जैन के स्थानीय समय के साथ और सभी मुहूर्त के समय के लिए डी.एस.टी समायोजित (यदि मान्य है)।
१९१२ पापमोचिनी एकादशी

समय - जो एकादशी होलिका दहन और चैत्र नवरात्रि के मध्य में आती है उसे पापमोचिनी एकादशी के रूप में जाना जाता हैं। यह सम्वत साल की आखिरी एकादशी है और युगादी से पहले पड़ती हैं।

उत्तर भारतीय पूर्णिमान्त पञ्चाङ्ग के अनुसार चैत्र माह में कृष्ण पक्ष के दौरान और दक्षिण भारतीय अमान्त पञ्चाङ्ग के अनुसार फाल्गुन माह में कृष्ण पक्ष के दौरान पापमोचिनी एकादशी पड़ती है। पूर्णिमान्त पञ्चाङ्ग और अमान्त पञ्चाङ्ग का यह भेद नाम-मात्र का है और दोनों पञ्चाङ्गों में पापमोचिनी एकादशी का व्रत एक ही दिन पड़ता है। अंग्रेजी कैलेण्डर के अनुसार वर्तमान में यह मार्च या अप्रैल के महीने में आती है।

एकादशी के व्रत को समाप्त करने को पारण कहते हैं। एकादशी व्रत के अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले करना अति आवश्यक है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले समाप्त हो गयी हो तो एकादशी व्रत का पारण सूर्योदय के बाद ही होता है। द्वादशी तिथि के भीतर पारण न करना पाप करने के समान होता है।

एकादशी व्रत का पारण हरि वासर के दौरान भी नहीं करना चाहिए। जो श्रद्धालु व्रत कर रहे हैं उन्हें व्रत तोड़ने से पहले हरि वासर समाप्त होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए। हरि वासर द्वादशी तिथि की पहली एक चौथाई अवधि है। व्रत तोड़ने के लिए सबसे उपयुक्त समय प्रातःकाल होता है। व्रत करने वाले श्रद्धालुओं को मध्याह्न के दौरान व्रत तोड़ने से बचना चाहिए। कुछ कारणों की वजह से अगर कोई प्रातःकाल पारण करने में सक्षम नहीं है तो उसे मध्याह्न के बाद पारण करना चाहिए।

कभी कभी एकादशी व्रत लगातार दो दिनों के लिए हो जाता है। जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब स्मार्त-परिवारजनों को पहले दिन एकादशी व्रत करना चाहिए। दुसरे दिन वाली एकादशी को दूजी एकादशी कहते हैं। सन्यासियों, विधवाओं और मोक्ष प्राप्ति के इच्छुक श्रद्धालुओं को दूजी एकादशी के दिन व्रत करना चाहिए। जब-जब एकादशी व्रत दो दिन होता है तब-तब दूजी एकादशी और वैष्णव एकादशी एक ही दिन होती हैं।.

भगवान विष्णु का प्यार और स्नेह के इच्छुक परम भक्तों को दोनों दिन एकादशी व्रत करने की सलाह दी जाती है।
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